हमारे बारे में

समानांतर साहित्य उत्सव

राजस्‍थान प्रगतिशील लेखक संघ द्वारा आयोजित

समानांतर साहित्‍य उत्‍सव के बारे में

समानांतर साहित्‍य उत्‍सव राजस्‍थान प्रगतिशील लेखक संघ की एक पहल है। यह लेखकों, कलाकारों, आम जनता और सार्वजनिक संगठनों-संस्‍थानों के सहयोग से आयोजित किया जाता है, इसलिए यह बहुतायत में आयोजित होने वाले कथित लिटरेचर फेस्टिवों से अलग है।
यह साहित्‍य, कला और संस्‍कृति के कारपोरेटीकरण और बाजारीकरण के विरुद्ध है।
समानांत साहित्‍य उत्‍सव हिंदी और भारतीय भाषाओं के अपने साहित्‍य, कला और संस्‍कृति का उत्‍सव है; न कि अंग्रेजी के वर्चस्‍व और पाश्‍चात्‍य संस्‍कृति के घटाटोप से आच्‍छादित उत्‍सव।
इसका उद्देश्‍य साहित्‍य और आम आदमी के बीच की दूरी को कम करना है। समानांतर साहित्‍य उत्‍सव का मुख्‍य ध्‍येय हिंदी और भारतीय भाषाओं के सर्वश्रेष्‍ठ लेखन और लेखकों को आम जन और पाठकों के सामने लाना है।
समानांतर साहित्‍य उत्‍सव रचना और रचनात्‍मकता का उत्‍सव है, न कि बाज़ार केंद्रित कथित लेखन को उत्‍सवमयी बनाने का।
यह उत्‍सव लेखक को सेलिब्रिटी बनाने का उत्‍सव है, न कि सेलिब्रिटी को लेखक के रूप में प्रस्‍तुत करने का उत्‍सव।
समानांतर साहित्‍य उत्‍सव लेखकों, किताबों, कला और कलाकारों के सरोकारों का उत्‍सव है, न कि सजावटी सामान, फैशनेबल कपड़ों और खान-पान का उत्‍सव।

समानांतर क्‍यों?

जब बाज़ार की शक्तियां साहित्‍य, कला और संस्‍कृति को एक आकर्षक माल या उत्‍पाद में परिवर्तित कर प्रस्‍तुत करती हैं, तो एक गंभीर धारा इसके समानांतर बहने लगती है। इतिहास में कला की दुनिया में समानांतर आंदोलन पहले-पहल फ्रांस में शुरु हुआ था, जब आर्ट गैलरियों का किराया बेतहाशा बढ़ा दिया गया था तो कलाकरों ने इसके विरुद्ध सड़क, फुटपाथ और चौराहों पर कला प्रदर्शनियां लगाकर अपनी कला को जनता के बीच पहुंचाया था। ऐसे समानांतर आंदोलन कला जगत में हमेशा होते रहे हैं। इसे आप हम नुक्‍कड़ नाटक, सार्वजनिक स्‍थलों पर कविता पाठ और यहां तक कि बांग्‍ला और हिंदी सिनेमा और साहित्‍य में देखते आए हैं। समानांतर साहित्‍य उत्‍सव इन महान आंदोलनों का, जनता और सरोकारों वाले जन-संगठनों और संस्‍थानों के सहयोग से आयोजित होने वाला उत्‍सव है। हम तंबाकू, शराब, गुटखा आदि का उत्‍पाद करने वाली और बहुराष्‍ट्रीय कंपनियों के साथ दागदार छवि वाले कारपोरेट घरानों से कोई सहयोग नहीं लेते हैं।

प्रगतिशील लेखक संघ के बारे में

साम्राज्‍यवाद का विरोध करने और साहित्‍य में प्रगतिशील-मानवतावादी मूल्‍यों को समाहित एवं विकसित करने के लिए सज्‍जाद जहीर और मुल्‍कराज आनंद ने कई लेखकों के साथ मिलकर 1935 में लंदन में प्रगतिशील लेखक संघ की स्‍थापना की थी। इसका पहला सम्‍मेलन 1936 में लखनऊ में हुआ था, जिसकी अध्‍यक्षता महान लेखक उपन्‍यास सम्राट मुंशी प्रेमचंद ने की थी। भारतीय भाषाओं के महानतम लेखक प्रगतिशील आंदोलन से जुड़े रहे हैं। हमें गर्व है कि हम उस महान विरासत के ध्‍वज वाहक हैं। फ़ैज़ अहमद फ़ैज़, मंटो, अली सरदार ज़ाफरी, वामिक जौनपुरी, शैलेंद्र, साहिर लुधियानवी, राजिंदर सिंह बेदी, राहुल सांकृत्‍यायन, इस्‍मत चुगताई, क़ैफी आज़मी, कृशन चंदर, अमृता प्रीतम, बलराज साहनी, भीष्‍म साहनी, डॉ. रामविलास शर्मा,मजाज़ लखनवी, केदारनाथ अग्रवाल और बहुत से महान लेखक-विद्वान प्रगतिशील आंदोलन से गहरे जुड़े रहे हैं।
1972 में औपचारिक रूप से राजस्‍थान प्रगतिशील लेख संघ की स्‍थापना से पहले भी राजस्‍थान में भी प्रगतिशील आंदोलन की एक महान परंपरा चली आती रही है।

27

जनवरी 2019रवींद्र मंच, रामनिवास बाग, जयपुर, राजस्थान, 302003

Meet The Organizers

Mr. Ritu Raj

Mr. Ritu Raj

Festival Chairman

Mr. Ish Madhu Talwar

Mr. Ish Madhu Talwar

Chief Convener

Mr. Prem Chand Gandhi

Mr. Prem Chand Gandhi

Convener, PLF

Mr. G.C.Bagri

Mr. G.C.Bagri

Chief Coordinator